देहरादून: हर्षिता।उत्तराखंड में इन दिनों चारधाम यात्रा जोरों शोरों से चल रही है, लेकिन केदारनाथ धाम जाने वाले यात्रियों के लिए चीरबासा क्षेत्र नासूर बनती जा रही है. गौरीकुंड से करीब 2.5 किलोमीटर आगे चीरबासा क्षेत्र में अक्सर भूस्खलन होता रहता है. जिसके चलते पैदल यात्रियों की जान भी हलक पर अटकी रहती है, बावजूद इसके अभी तक भूस्खलन के मिटिगेशन को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है.
जबकि, हर साल मानसून सीजन के दौरान भूस्खलन की वजह से रास्ता बाधित हो जाता है. बहरहाल, इस क्षेत्र के अध्ययन के लिए आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से टीम भी भेजी गई थी. ताकि, बेहतर ढंग से इसका अध्ययन कर मिटिगेशन किया जा सके. आखिर क्यों संवेदनशील है चीरबासा क्षेत्र, आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से इसके लिए क्या किया जा रहा है काम? आपको विस्तार से बताते हैं.
बता दें कि बाबा केदार के दर्शन करने जाने वाले यात्री गौरीकुंड से करीब 2.5 किलोमीटर आगे चीरबासा क्षेत्र से होकर केदारनाथ मंदिर पहुंचते हैं, लेकिन चीरबासा क्षेत्र यात्रियों के लिए लगातार खतरे का पर्याय बनता जा रहा है. पहाड़ी से गिरते बोल्डर, अचानक सक्रिय होने वाले भूस्खलन और संकरे पैदल मार्ग के चलते यहां हर कदम जोखिम भरा है. हैरानी की बात ये है कि सितंबर महीने में कुछ ही दिनों के भीतर हुई दो बड़ी घटनाओं ने प्रशासनिक तैयारियों और स्थायी मिटिगेशन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
संवेदनशील क्यों है चीरबासा? चीरबासा की संवेदनशीलता सिर्फ भारी बारिश तक सीमित नहीं है. बल्कि, इस क्षेत्र में कई प्राकृतिक और मानवीय कारण एक साथ काम करते हैं. केदारनाथ पैदल मार्ग ऊंचे हिमालयी क्षेत्र से गुजरता है, जहां चट्टानों, मलबे और ढीली मिट्टी वाली ढलानें बारिश के बाद तेजी से कमजोर होती हैं. कई स्थानों पर पैदल मार्ग पहाड़ी ढलान और नदी-नाले के बीच से गुजरता है.
पत्थरों से बचने के लिए नहीं मिलता है मौका: यात्रियों के पास अचानक गिरते पत्थरों से बचने के लिए स्थान नहीं मिल पाता है. इसके अलावा, यात्रा सीजन के दौरान सीमित मार्ग पर बड़ी संख्या में पैदल यात्री, घोड़े और खच्चर चलते हैं. इससे मार्ग का कटाव और किनारे कमजोर हो जाते हैं. जिस वजह से इस क्षेत्र में लगातार भूस्खलन का सिलसिला जारी रहता है.
