भोपाल,डी टीआई न्यूज़।फर्ज कीजिए कि आपके दोस्त या फैमिली में किसी का बर्थडे हो। आप केक खरीदने के लिए मार्केट निकले और वो न मिले।
तो आप क्या करेंगे? आपका मूड कैसा होगा? दोस्ती निभाने के लिए आप कहां तक जाएंगे?

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के रहने वाले चार दोस्तों के साथ जब ऐसा हुआ तो उन्होंने कुछ ऐसा किया जो बिजनेस की दुनिया में कभी नहीं हुआ था। उन्होंने 24×7 केक सप्लाई करने की एक कंपनी ही खड़ी कर डाली।

केक बनाने की कंपनी ‘अर्बन तोहफा’ में अपने दोस्तों और को-फाउंडर्स के साथ बैठे नीरज विश्वकर्मा आज भी उन दिनों को याद करते हैं, तो चारों दोस्तों की हंसी छूट जाती है।
नीरज वो किस्सा बताते हैं। कहते हैं, 2016 का साल था, हम अपने दोस्त नितिन का बर्थडे सेलिब्रेट करने के लिए आधी रात में केक खोज रहे रहे थे। पूरे शहर को छान मारा, कई बेकरी शॉप को कॉल कर लिया, लेकिन केक नहीं मिला।

एक-दो दिन बाद जब हम चारों दोस्तों ने इस प्रॉब्लम को डिस्कस किया, तो आइडिया आया कि क्यों न छोटे शहरों में भी 24×7 केक सप्लाई करने की कंपनी बनाई जाए। यदि उस रात हमें केक मिल गया होता, तो यहां बैठकर ये बातें नहीं हो रही होती।

ये चारों स्कूल फ्रेंड्स हैं अब बिजनेस पार्टनर्स। सभी ने हायर एजुकेशन के लिए अलग-अलग पढ़ाई-लिखाई की और फिर कुछ साल तक प्राइवेट जॉब भी।

नीरज बताते हैं, हम चारों एक ही मोहल्ले में खेले-कूदे हैं। 2011-14 में बी कॉम कंप्लीट करने के बाद करीब दो साल तक प्राइवेट कंपनियों में सेल्स की नौकरी की। पापा मोटर वाइंडिंग की शॉप चलाते हैं, इसलिए शुरुआत से ही घर पर कमाने का प्रेशर था। 12वीं पास करने के बाद से ही मैंने छोटे-छोटे काम करने शुरू कर दिए थे। खुद की बदौलत पढ़ाई की और अब बिजनेस…

लेकिन लोअर मिडिल क्लास से आने की वजह से न बिजनेस शुरू करना आसान था और न ही रिस्क लेना। हम चारों की हालत वैसी ही थी। हालांकि, एक-दो दोस्तों का फैमिली बैकग्राउंड फिर भी ठीक था, लेकिन इतना भी नहीं कि बिजनेस शुरू करने की हिम्मत कर पाए।
बात करते करते नीरज, विक्रम के कंधे पर हाथ रखते हैं और उनकी तरफ देखकर मुस्कुराते हैं। और विक्रम पाटीदार बताना शुरू करते हैं कि उन्होंने पुणे से एमबीए किया है। 2016 में नौकरी छोड़कर जब इस बिजनेस पर प्लान करना शुरू किया, तो घरवालों को काफी ऐतराज था। नाराजगी ऐसी कि उन्हें करीब 6 महीने तक बेकरी स्टोर पर सोना पड़ा।

दरअसल, घरवालों का मानना था कि दोस्ती में बिजनेस तो बिल्कुल भी नहीं की जा सकती है। एक तो केक का बिजनेस, ऊपर से 4 दोस्त। क्या कमाएंगे, क्या बचाएंगे , क्या बांटेंगे और क्या खाएंगे?

विक्रम की बातों में नीरज अपनी बात मिलाते हुए कहते हैं, आज देखिए! न हमने दोस्ती छोड़ी और न ही बिजनेस।
नीरज कहते हैं, केक कैसे बनता है? कहां बनता है? कौन-कौन सी चीजों का इस्तेमाल होता है? हम चारों में से किसी को भी बेकिंग का कोई नॉलेज नहीं था। विक्रम वेडिंग प्लानर था, प्रशांत सिम-कार्ड बेचता था जबकि नितिन मार्केटिंग का काम कर रहा था।

हम सभी ने जॉब छोड़कर केक बनाने के लिए रिसर्च शुरू किया। रॉ मटेरियल के इस्तेमाल होने से लेकर इसकी क्वालिटी, मार्केट डिमांड… हर चीज को फिल्टर करना शुरू किया।

इसी दौरान मुंबई में लगने वाले बेकरी बिजनेस एग्जीबिशन के बारे में पता चला। हम चारों दोस्तों ने वहां जाकर इसके पूरे मेथड को सीखा। केक बनाने से लेकर मशीनों के इस्तेमाल होने तक की पूरी जानकारी ली।

यहां कई अच्छे शेफ और केक इंडस्ट्री के बड़े नामों से मुलाकात हुई। जिसके बाद हमें लगा कि अब अपना बिजनेस शुरू किया जा सकता है।
नीरज बताते हैं, अब चुनौती इस बात की थी कि हम केक का बिजनेस स्टार्ट कैसे करें? सेविंग के नाम पर तो कुछ था ही नहीं नीरज की बातों को सुनकर नितिन के चेहरे पर वो वक्त दिखाई देने लगता है, जब उनको बिजनेस में इन्वेस्ट करने के लिए अपनी सोने की चेन गिरवी रखनी पड़ी थी। वो कहते हैं, घरवाले पैसे नहीं देना चाह रहे थे।

दरअसल, उन्हें भरोसा ही नहीं था कि हम कुछ अच्छा कर रहे हैं। मैं सोचता था कि कब तक दूसरों के यहां मजदूरी करता रहूंगा। इसलिए जब 2017 में ‘अर्बन तोहफा’ कंपनी शुरू करने के लिए जब पैसों की जरूरत पड़ी, तो मैंने बिना सोचे अपनी चेन गिरवी रखकर बैंक लोन ले लिया।

नीरज इस जख्म को थोड़ा और खुरेदते हैं। वो कहते हैं, हमारे पास दूसरा कोई ऑप्शन नहीं था। हम में से किसी ने सोने की चेन गिरवी रखी, तो किसी ने पर्सनल लोन लिया।एक वक्त पर हमारे पैरेंट्स को राजी करना सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसमें हम नाकाम रहे, लेकिन हमने बिजनेस में अव्वल होने की ठानी।

शुरुआत में हम केक बनाने की यूनिट नहीं लगा सकते थे, इसलिए होममेकर्स (घरों में बनाए जाने वाला केक) के साथ टाइ-अप किया। हम पहले ऑर्डर लेते थे, फिर होममेकर्स से बनवाकर, कस्टमर तक पहुंचाते थे। अधिकांश केक की डिमांड आधी रात को ही होती थी, क्योंकि हमारा कांसेप्ट ही था मिड-नाइट केक वाला। एक केक सेल करने पर 50 से 100 रुपए बचता था।

लेकिन चुनौती तो यहां से आनी शुरू हुई। हमें याद है कि रात के 12 बजे, 2 बजे आधी-तूफान, ओले-बारिश के बीच हम केक पहुंचाने जाते थे। बाइक या साइकिल से केक ले जाते थे। कभी-कभी तो सड़क पर घुटनों तक पानी भरा होता था।

फिर हमने खुद से केक बनाना शुरू किया। इसका भी एक दिलचस्प वाकया है। केक में इस्तेमाल होने वाले क्रीम को मिक्स करने वाली ग्राइंडिंग मशीन तो हमने मुंबई से मंगवा ली थी, लेकिन काउंटर और फर्निचर सेट कबाड़ से खरीदकर सेटअप किया।

हमने केक की क्वालिटी को मेंटेन करना शुरू किया, जिससे धीरे-धीरे कस्टमर्स बढ़ने लगे। अलग-अलग वैराइटी के केक्स बनाने के लिए हमने कई शेफ्स से मिलना शुरू किया, कुछ बड़ी कंपनियों के शेफ को बुलाकर हमने वर्कशॉप भी ली। आज भी हम ऐसा करते रहते हैं। मार्केट में कौन-सी चीजें ट्रेंड में है, उसे अपडेट करते रहते हैं।
विक्रम, मार्केटिंग स्ट्रेटेजी को लेकर दिलचस्प चीजें बताते हैं। कहते हैं, मेरा वेडिंग प्लान करने का बिजनेस था। इसे मैं अभी भी थोड़ा बहुत वक्त मिलने पर करता हूं। जब केक बनाने के बिजनेस की शुरुआत की, तो मैं जिस वेडिंग में जाता था, उन्हें अपने बिजनेस के बारे में बताता था।

प्रशांत पहले से टेली कम्यूनिकेशन में काम कर रहे थे, तो उनका भी काफी कॉन्टैक्ट था। लोगों को हम कॉल करके अपने बिजनेस के बारे में बताने लगे।

देखा जाए, तो आज के दौर में केक हर सेलिब्रेशन का हिस्सा बन चुका है। यदि किसी की बड़ी फैमिली है, तो हर महीने उनके यहां कुछ-न-कुछ होता ही रहेगा। इसलिए मान लीजिए कि जिन लोगों ने हमसे इस साल केक खरीदा, उन्हें हम अगले साल रिमाइंड कराते हैं।

कस्टमर्स के लिए हमने कुछ प्रीमियम ऑफर भी प्लान किया है। यदि किसी फैमिली में लगातार सेलिब्रेशन होता रहता है, तो हम उन्हें एनुअल ऑफर देते हैं। ताकि वो हमसे केक खरीदते रहें और उन्हें वो चीजें मार्केट रेट से सस्ता मिले।


वो कहते हैं, मार्केट ग्रोथ के लिहाज से हमने शहर के कॉर्पोरेट हाउसेज के साथ भी टाइ-अप करना शुरू किया। दरअसल, यहां बल्क में डिमांड होती है। कॉर्पोरेट हाउस चाहती है कि वो अपने एंप्लॉय का बर्थडे बेहतर ढंग से सेलिब्रेट करें, जो हमारे लिए बड़ी ऑपर्चुनिटी दिखी, लेकिन इसके लिए भी हमें लंबा इंतजार करना पड़ा।

शुरुआती दिनों की बात है। 2017-18 में जब हमने कंपनी की शुरुआत की थी, तो 10-15 दिनों तक एक भी ऑर्डर नहीं आता था।

विक्रम ने वेबसाइट डिजाइन और पेज डेवलपिंग का भी कोर्स किया हुआ है। वो कहते हैं, मेरा मार्केटिंग और वेब में शुरू से इंट्रेस्ट था। इसे मैंने अपने बिजनेस में इस्तेमाल करना शुरू किया।

फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए कंपनी को प्रमोट किया। इससे भोपाल के लोगों के बीच हमारी रीच बढ़ने लगी। अखबारों में विज्ञापन भी दिया, जिसके बाद सेल्स बढ़ने लगा।

आज हर दिन हम 50 से ज्यादा केक की सप्लाई कर रहे हैं। इसके लिए 16 लोगों की टीम काम करती है और हमारे पास 4 डिलीवरी पार्टनर्स हैं, क्योंकि केक डिलिवरी के लिए हम थर्ड पार्टी डिलिवरी कंपनी पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं कर सकते हैं।

By DTI