देहरादून, हरिद्वार, हर्षिता।उत्तराखंड में आगामी एसआईआर (Special Intensive Revision) को लेकर राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां तेज होती दिखाई दे रही हैं. राज्य की कई मस्जिदों में ऐसे पोस्टर और सूचना पट्ट लगाए गए हैं, जिसमे 40 साल पुराने कागज लाने की बात लिखी गई है. इन पोस्टरों में खासतौर पर निवास, पहचान और मतदाता सूची से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रखने को कहा गया है, ताकि पुनर्निरीक्षण प्रक्रिया के दौरान किसी तरह की दिक्कत का सामना न करना पड़े.

राजधानी देहरादून के पलटन बाजार क्षेत्र समेत कुछ अन्य इलाकों में लगे इन पोस्टरों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद से जुड़े स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा भी समुदाय के लोगों को दस्तावेज व्यवस्थित रखने और सरकारी प्रक्रिया में सहयोग करने की सलाह दी जा रही है. दूसरी ओर इस मुद्दे को लेकर प्रदेश में डेमोग्राफी चेंज (जनसांख्यिकीय परिवर्तन), बाहरी मतदाताओं और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों पर बहस को फिर हवा मिल गई है.

क्या है SIR और क्यों बढ़ी इसकी अहमियत: दरअसल SIR चुनाव आयोग की वह प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता सूची का व्यापक सत्यापन किया जा रहा है. इसमें यह जांच हो रही है कि सूची में दर्ज मतदाता सही में संबंधित क्षेत्र में निवास कर रहे हैं या नहीं. कहीं एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर तो दर्ज नहीं है. साथ ही नए पात्र मतदाताओं के नाम सूची में जोड़े जाएंगे.

उत्तराखंड में यह प्रक्रिया अगले कुछ हफ्तों में शुरू होने की संभावना जताई जा रही है. राज्य में कुल 11,733 पोलिंग बूथ बताए जा रहे हैं, जबकि करीब 811 नए पोलिंग बूथ बनाए जाने की भी चर्चा है. SIR को लेकर प्रशासन ने अपनी तैयारी पूरी कर ली है.

प्रदेश में पिछले कुछ समय से यह चर्चा भी रही है कि कई जिलों में मतदाता सूची में दर्ज नाम मौके पर नहीं मिल पा रहे हैं. विशेषकर सीमावर्ती और शहरी इलाकों में ऐसे मतदाताओं की संख्या को लेकर राजनीतिक दल अलग-अलग दावे कर रहे हैं. आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि दूसरे राज्यों से आकर बसे कुछ लोगों के नाम उत्तराखंड के साथ-साथ उनके मूल राज्यों की मतदाता सूचियों में भी दर्ज हैं. हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन बीजेपी लगातार इस बात पर जोर देती रही है.

By DTI