देहरादून: हर्षिता। नए साल की दस्तक पर उत्तराखंड इस बार कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा है। दिसंबर के अंतिम हफ्तों में जब नैनीताल, मसूरी, औली और मुनस्यारी की वादियां बर्फ की सफ़ेद चादर ओढ़ लेती थीं, इस बार वही पहाड़ सूखे और काले नजर आ रहे हैं। सैलानी ठंड तो भरपूर महसूस कर रहे हैं, पर बर्फ की कमी ने पर्यटक स्थलों का रोमांच फीका कर दिया है।
🌨️ बर्फबारी गायब, ठंड बरकरार
होटल और पर्यटन कारोबारियों का कहना है कि नए साल पर आने वाले ज्यादातर टूरिस्ट बर्फ की उम्मीद में पहुंचते हैं।
लेकिन इस बार आसमान पूरी तरह साफ है, पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं, और नतीजा—बर्फ कहीं नजर नहीं।
मसूरी: सड़कों पर चहल-पहल, पर बर्फ का निशान नहीं
औली: माइनस तापमान, पर स्की स्लोप सूखे
नैनीताल: झील किनारे पर्यटक उमड़े, लेकिन बर्फ की कमी से मायूसी
ठंड जितनी कड़वी है, उतनी ही बर्फबारी से दूरी भी चुभ रही है।
🕒 कब गिरेगी बर्फ? मौसम विभाग की भविष्यवाणी
मौसम वैज्ञानिक रोहित थपलियाल के अनुसार:
बर्फबारी की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई
पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होते ही ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी संभव
पर नए साल से ठीक पहले भारी बर्फबारी की संभावना बेहद कम
कुछ जगहों पर हल्की बारिश या बर्फबारी दिख सकती है, लेकिन बहुत सीमित
यानी उम्मीद बाकी है, पर फिलहाल आसार कमज़ोर हैं।
🔥 पहाड़ों में आग — ठंड में तपती जंगलों की चिंता
बर्फ न सही, आग जरूर गिर रही है—जंगलों में।
उत्तराखंड में नवंबर से अब तक जंगल की आग की 19 घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं।
अब तक 8.39 हेक्टेयर जंगल जल चुका है।
सबसे ज्यादा असर
गढ़वाल मंडल: 13 घटनाएं
नुकसान: 4.4 हेक्टेयर
वन्यजीव संरक्षण क्षेत्र: 6 घटनाएं
नुकसान: 3.99 हेक्टेयर
ठंड के बीच नमी की कमी ने जंगलों को सूखी लकड़ी बना दिया है, जो जरा सी चिंगारी में जल उठते हैं।
यह आग सिर्फ पेड़ों को नहीं, बल्कि वन्यजीवों और पूरे पर्यावरण तंत्र को करीब से चोट पहुंचा रही है।
🌍 पर्यावरण और पर्यटन — दोनों पर संकट की दस्तक
एक ओर बर्फबारी कम होने से पर्यटन उद्योग दबाव में है,
दूसरी ओर जंगलों में आग से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है।
नया साल आने से पहले प्रकृति उत्तराखंड को दो बड़े संदेश दे रही है —
बदलता मौसम और बढ़ता खतरा।
