हरिद्वार हर्षिता।उत्तराखंड की नदियाँ आज सिर्फ जलधाराएँ नहीं, बल्कि पहाड़ों पर हो रहे अत्याचार और प्रशासनिक लापरवाही की मूक गवाह बन चुकी हैं। अवैध खनन ने नदियों को भीतर तक खोखला कर दिया है। रेत, बजरी और पत्थरों की अंधाधुंध लूट ने उन नदियों की रीढ़ तोड़ दी है जो कभी जीवन और समृद्धि का आधार हुआ करती थीं।
नदी तल से छेड़छाड़—आपदाओं का नया कारण
भारी मशीनों से दिन-रात खनन कर नदियों की प्राकृतिक संरचना को तहस-नहस किया जा रहा है। इसका सीधा असर—
नदियों की दिशा बदलना
किनारे बसे गाँवों में कटाव
खेतों का बह जाना
घरों की नींव कमजोर पड़ना
यह सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि हजारों जिंदगियों से जुड़ा संकट है।
केदारनाथ से जोशीमठ तक—आपदाओं की कड़ी चेतावनी
2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की ऋषिगंगा आपदा और 2023 का जोशीमठ धंसाव…
ये सभी घटनाएँ एक ही संदेश देती हैं—
जब प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है, विनाश अवश्यंभावी होता है।
विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि अनियंत्रित खनन नदियों के बहाव को अस्थिर करता है, जिससे बाढ़, भूस्खलन और भू-धंसाव और तेज़ी से बढ़ते हैं।
बाढ़ का खतरा बढ़ा, जैवविविधता खत्म
खनन से बने गहरे खड्डे बाढ़ के पानी को आबादी की ओर मोड़ देते हैं।
नदियाँ अपनी स्वाभाविक शक्ति खोकर नए रास्ते बनाने लगती हैं।
इसका असर—
खेती बर्बाद
पशुपालन संकट में
पर्यटन पर असर
मछलियाँ व प्रवासी पक्षी अपने आवास छोड़ने को मजबूर
सबसे बड़ा सवाल—यह सब किसकी निगरानी में हो रहा है?
रात के अंधेरे में चलने वाली मशीनें दिन में व्यवस्था की कमजोरी बेनकाब करती हैं।
जहाँ रोक होनी चाहिए, वहाँ मौन है।
जहाँ सख़्ती होनी चाहिए, वहाँ ढील है।
अदालतों के आदेश और नियम कागज़ों तक सीमित न रह जाएँ, यह सुनिश्चित करना ही अब असली चुनौती है।
समाधान क्या?
स्थानीय समुदायों को संरक्षण में शामिल करना
तकनीक आधारित निगरानी
अवैध खनन पर ज़ीरो टॉलरेंस
पारदर्शी और सख़्त प्रशासनिक कार्रवाई
क्योंकि नदियाँ बचेंगी तभी भविष्य बचेगा
उत्तराखंड की नदियाँ केवल संसाधन नहीं—जीवित सभ्यताएँ हैं।
अगर इन्हें अभी नहीं बचाया गया, तो पहाड़, खेत और आने वाली पीढ़ियाँ एक अंधकारमय भविष्य की ओर धकेल दी जाएँगी।

By DTI